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समाजवाद

Feed by sandy Cat- Essay

पहले भारत एक कृषि प्रधान देश था किंतु अब बडे पैमाने के उद्योग स्थापित होने लगे हैं। अब अन्य देश भी अपना पैसा भारत में निवेश करके उद्योग स्थापित करने लगे हैं। जैसे-जैसे उद्योग बढे हमारा समाज दो भागों में विभाजित हो गया-एक पूंजीवादी तथा अन्य श्रमिक या कर्मचारी हैं। इस समाज में पूंजीवादी अपने लाभ के लिए श्रमिक वर्ग का शोषण करते हैं। वे श्रमिकों का उपयोग करके धन अर्जित करते हैं। पूंजीवादी, समाज में सम्मान व उच्च स्थान प्राप्त करते हैं तथा श्रमिक वर्ग को समाज में सभी के द्वारा निम्न दृष्टि से देखा जाता है।

यह विभाजन इन दोनों को एक-दूसरे से दूर करता है व इनके बीच अत्यधिक दूरी बना देता है। केवल समाजवाद ही एक ऐसा रास्ता है जिससे कि दोनों वर्गों को एक साथ लाया जा सकता है। समाजवाद मानव की समानता पर विश्वास करता है। किसी को भी धनी अथवा महान नहीं समझा जाता। सभी समान हैं। समाजवाद में एक व्यक्ति अन्य व्यक्ति का शोषण नहीं करता। धनी व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के श्रम पर आश्रित नहीं होता। समाजवाद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने श्रम का परिश्रमिक प्राप्त करने का धिकार है। यह धनी को और अधिक धनी बनने की अनुमति नहीं देता।

समाजवाद एक ऐसा विषय है जिसमें आर्थिक तथा सामाजिक रुप से सभी समाज है। समाजवाद का अर्थ यह नहीं है कि सभी की कमाई समान हो अथवा सभी को समान स्थान मिले। यह सत्य सोच में समानता प्रदर्शित करता है। इस का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को कार्य करने का अवसर मिले तथा उसे उसके कार्य का उचित पारिश्रमिक मिले।

यहां तक कि बालकों को भी चाहे वह धनी परिवार से हों अथवा गरीब परीवार से, उन्हें शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिएं। इस प्रकार एक गरीब बालक को शिक्षा में वह सभी सुविधाएं प्राप्त मिलने चाहिएं। इस प्रकार एक गरीब बालक को शिक्षा में वह सभी सुविधाएं प्राप्त चाहिए जो कि एक धनी बालक को प्राप्त हों। ठीक इसी प्रकार से समाजवाद का अर्थ है कि सभी पुरुषों को जाति, धर्म इत्यादि के बजाय उनके शिक्षा व योग्यता के अनुरुप रोजगार प्रदान किया जाए।

समाजवाद का अर्थ है कि धन को एक या कुछ व्यक्तियों के हाथों में जमा न किया जाए। बल्कि उसका वितरण इस प्रकार किया जाए कि धनी व्यक्ति और धनी न हो तथा गरीब व्यक्ति और गरीब न हो। समाजवाद धनी व गरीब के मध्य के अंतर को दूर करता है। कोई भी लोकतांत्रिक सरकार समाजवाद अर्थात आर्थिक समानता के बिना सफल नहीं हो सकती। अत: यदि समाजवाद को सही अर्थों में अपनाया जाए तो आपसी, द्वेष, भेद-भाव व विस्फोट की स्थितियां दूर हो सकती हैं।

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