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चरित्र-निर्माण

Feed by Kumar Sanu Cat- Essay

चरित्र का अर्थ है-आचरण या चाल-चलन। यहां आचरण का अर्थ है-सदगुणों का समुच्चय। जिस व्यक्ति के व्यवहार में सत्य, न्याय, प्रेम, मानवता, करुणा, दया, अहिंसा, त्याग आदि गुण एकत्र हो जाते हैं, वह चरित्रवान कहलाता है। इसके विपरीत, जिनमें ये गुण क्षीण होते हैं, या कमजोर होते है, वे पतित या चरित्रहीन कहलाते हैं।

चरित्र का निर्माण जन्मजात गुणों और आदत से ढाले गए व्यवहार हो मिलाकर होता है। जन्मजात गुण ईश्वर की देन है, परंतु आदतें अपने हाथ में होती है। गांधी जी का उदाहरण हमारे सामने है। वे प्रतिभा में अत्यंत सामान्य थे। परंतु उन्होंने सत्य, अहिंसा और न्यान के जो गुण अपने जीवन में ढाले, उसी के परिमाणस्वरुप उन्हें ऐसा उज्जवल चरित्र मिला जिससे सारे विश्व को प्रकाश प्राप्त हुआ।

चरित्र-निर्माण एक साधना है। इसे अपने ही प्रयास से पैदा किया जा सकता है। इसका तरीका भी बहुत सरल है-सदगुणों पर चलना, अवगुणों से बचना, प्रेम, त्याग, करुणा, मानवता, अहिंसा को अपनाना तथा लाभ, मोह, निन्दा, उग्रता, क्रोध, अगंकार को छोडना। परंतु यह सरल-सा मार्ग ही साधना के बिना कठिन हो जाता है।

चरित्रवान व्यक्ति स्वयं को धन्य अनुभव करता है। उसे अपना जीवन सफल प्रतीत होता है। संसार की सारी खुशियां उसके चारों ओर घूमती है। उसके चारों ओर आशा और उत्साह का ऐसा प्रकाश-मण्डल घिर आता है कि संसार के कष्ट भी उसका कुछ नहीं बिगाड सकते। चरित्रवान व्यक्ति को मिले कांटे भी फूल बन जाते है। अपमान भी सम्मान बन जाते हैं, जेल की सींखचे उसके लिए मन्दिर बन जाते हैं। विष के प्याले अमृत बन जाते हैं। चरित्रवान व्यक्ति अत्याचारियों के अत्याचार भी सहता है, तो वह उसके लिए आनन्दायी इतिहास बन जाता है। सूली पर चढकर भगतसिंह को गौरव प्राप्त हुआ, गांधीजी को गोली खाकर अमरत्व मिला, ईसा मसीह सूली पर चढकर जन-जन के ह्रदयों में बस गए।

यह आवश्यक नहीं कि चरित्रवान व्यक्ति को सफलता मिले। परंतु चरित्रवान व्यक्ति जब तक जीता है संतुष्ट रहता है। उसे अपने किए पर पछतावा नहीं होता। वह छाती तानकर, नजरें उठाकर शान से जीता है।

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