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सिनेमा

Feed by Kumar Sanu Cat- Essay

जब से मानव पैदा हुआ है, तब से ही उसकी अनोरंजन की चाह भी विकसित हुई है। एक समय था जब ‘राग-रंग’ मनोरंजन का साधन हुआ करता था, रात-रात भर महफिल जमती थी। फिर वक्त आया कि लोगों को यूं वक्त बर्बाद करना पसन्द नहीं आया और कई शौकों ने जन्म लिया। जैसे-क्लब, घुड सवर, दौड इत्यादि और अंतत: जन्म हुआ सिनेमा का। कुछ ही समय में दूसरी दुनिया और हालातों में पहुंचा देने वाला सिनेमा मानव मन को भा गया।

सिनेमा का जोर अपने उत्कर्ष पर था, कि तभी कहीं से वीडियों ने जन्म लिया और सिनेमा के चाहने वालों एवं सिनेमा से कमाने वालों को एक धक्का-सा लगा। जब वीडियो नया-नया आया तो एक बार तो ऐसा लगा कि बस सिनेमा व्यवसाय तो अब डूबा और तब डूबा। नयी-नयी वस्तु को देखने की ललक एवं क्रियाविधि, जो कि किसी चमत्कार से कम न मानी जाती थी, ने घर-घर में घर कर लिया। शुरु में सिर्फ सम्पन्नता एवं वैभव का प्रतीक माने जाने वाले वीडियो ने धीरे-धीरे एक आवश्यकता का रुप ले लिया।

हालत कुछ ऐसी हो गई कि सिनेमा-हॉल खाली रहने लगे एवं वीडियो-लाइब्रेरी पर भीड बढने लगी। गरीब तबके केलोग भी यह समझ गए कि अगर ज्यादा व्यक्ति फिल्म देखें तो वीडियो किराए पर लाना सस्ता पडेगा। सस्ता मनोरंजन और फिर चाहे जैसे देखो। चाओ तो लेट कर देखो या फिर कोई काम पडे तो बीच में रोक भी लो, अब तो वीडियो के वारे-न्यारे हो गए।

हलांकि पिछले कुछ सालों में भारतीय सिनेमा का हालत सुधरी है। एक बार ऐसी फिल्मों का निर्माण जिन्हें बडे पर्दे पर देखने का मोह छोडना मुश्किल हो, सुगम गीत एवं संगीत, अच्छे अभिनय तथा निर्देशन के कारण सिनेमा हॉलो पर ‘हाउस-फुल’ की तख्ती लगना फिर शुरु हो गई है परंतु फिर भी वीडियो चल रहा है और अब तो सिनेमा के लिए एक नया दैत्य खडा हो ग्या है ‘केबल टी.वी.’।

सिनेमा चलता रहा और चलता रहेगा, जरुरत है तो सिर्फ अच्छी पटकथा, अच्छे अभिनय एवं अच्छे निर्देशन की और सर्वोपरि अच्छे मनोरंजन की क्योंकि आज के युग के मानव के पास समय बहुत कम है और वह कम समय में अधिकाधिक मनोरंजन चाहता है। वेडियो मानव जीवन में मनोरंजन की दृष्टि से तो उपयोगी है ही, साथ ही शैक्षिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। जो बात या नियम हम पढते हैं और फिर उन्हीं को वीडियो के माध्यम से देखते हैं। तब वह सिद्धांत समझने में आसानी भी होती है तथा यह रुचिकर भी लगता है। आज विद्यालयों में ‘वीडियो-शिक्षा-प्रणाली’ बडे पैमाने पर अपनाई जा सकती है और यह काफी हद तक सफल भी है।

वीडियो जहां मानव जीवन के शैक्षिक व बौद्धिक विकास में सहायक है, तभी मानव के मनोरंजन में सहायक है, वहीं यही वीडियो चारित्रिक विकास में बाधक है। अश्लीलता का बाजार गर्म करने के लिए वीडियो काफी हद तक उत्तरदायी है।

जो व्यक्ति पहले शर्मा के कारण अश्लील फिल्में देखने हाल में नहीं जा पाता था अब वह खुलेआम दुकानों पर वही फिल्म मांगता नजर आता है। व्यस्क तो वयस्क किशोरावस्था में कदम-रखते नैनिहाल भी ‘मम्मी-पापा’ से छिपकर इन फिल्मों का ‘रसास्वादन’ करते है। पहले डरते-डरते एक, फिर एक और फिर तो चरित्र की गाडी के पहिए ‘स्टेपनी’ समेत धीरे-धीरे पंक्चर होते रहते हैं। और इसके मूल में है तो वह है-वीडियो।

बाकी बुराईयों जैसे ‘आंखों की खराबी’ तो ऐसी है जो सिर्फ नाम-मात्र की है परंतु सिनेमा की नींव में सुराख कर अश्लीलता का व्यापार करने वाला वीडियो तब तक फलता-फूलता रहेगा जब तक हमारे रक्षक, भक्षक बने रहेंगे, जब तक चारित्रिक मजबूती नहीं आएगी तथा जब तक इसके खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाए जायेंगे।

शैक्षिक वीडियो का प्रयोग उपयोगी एवं आवश्यक भी है। मनोरंजक वीडियो भी अच्छा है, परंतु यदि वीडियो से होने वाली चारित्रिक अवनति को न रोका गया तो भारतीय सस्कृति एवं सभ्यता को गहरा धक्का लगेगा।

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