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होली

Feed by Kumar Sanu Cat- Essay

होली रंगों का त्योहार है। यह हर्षोल्लास, एकता तथा मिलन का प्रतीक है। इस दिन चारों ओर राग-रंग, उल्लास तथा उमंग का वातारण होता है। यह फाल्गुन (वसंत) के महीने में आती है।

होली का त्यौहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। शरद ऋतु की विदा और गर्मी का स्वागत करने केल इए लोग अत्यंत उल्लस से इस त्यौहार को मनाते है। इस अवसर पर किसानों को फसलें खेतों में पकी खडी रहती है। लहलहाती फसलों को देखकर कृषक मस्ती में झूमते, नाचते, गाते है।

होली के दिन रात्रि के समय होलिका दहन किया जाता है। लोग इसकी परिक्रमा करते हैं और नए अनाज की बालें भूनकर अपने इष्ट मित्रों में बांटते है। होलिका दहन के बाद लोग परस्पर एक-दूसरे को गले मिलते है। यह त्योहार भी नये त्यौहारों की तरह ही बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रुप में मनाया जाता है।

अगले दिन रंग खेला जाता है। चारों ओर रंग, गुलाल दिखाई देता है। बच्चे रंगों से पिचकारी भरकर मारते है। तो युवक-युवतियां सभी आपसी भेदभाव भुलाकर ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के अंतर को भूलकर एक-दूसरे पर रंग डालते है तथा गुलाब लगाते है।

प्रेम, एकता तथा सौहार्द ही होली के प्राण है। हमें होली मनाते समय इन्हीं आदर्शो को सामने रखना चाहिए। मिलन के पुनीत अवसर पर मन्दिरा पान करके कीचड तथा तेल के रंगो का प्रयोग नही करना चाहिए, तथा झगडों के अन्य सभी कारणों से बचना चाहिए, तथा त्यौहार की पवित्रता का भंग नही होने देना चाहिए।

हमारा कर्तव्य है कि हम प्रत्येक को मनाते समय उसके आदर्शो के अनुरुप ही आचरण करें। आज भारत में जिस प्रकार से घृणा, वैमनस्य, कटुता तथा ईर्ष्या-द्वेष का वातावरण व्याप्त है, होली जैसे त्योहार वैर-भाव को मिटाने में समर्थ हो सकते हैं तथा सद्भावना कायम कर सकते हैं। होली के अवसर पर जिस प्रकार लोग एक-दूसरे के गले मिलते हैं। उससे ऊंच-नीच, छुआ-छूत तथा शत्रुता एवं अलगाव की भवनाएं स्वत: दूर हो जाती है।

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