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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

Feed by Kumar Sanu Cat- Essay

आजादी के इतिहास को जिन्होंने स्याही से नहीं अपने खून से लिखा; भाषणों से नहीं बलिदानों से लिखा, दीनता और याचना से नहीं प्रचण्ड साहस और भीषण संघर्ष से लिखा, जिन्होंने आजादी की मन्द हिलोरों को शोलों बदल दिया। जिन्होंने देश के नवयुवकों में सर्वस्व न्यौछावर करने की प्रखर लालसा जगा दी, युवतियों में रणचण्डी बनने की व्यग्रता जगा दी, जिन्होंने खून के बदले आजादी के आह्वान करके युवकों की रग-रग में आग लगा दी। उन स्वतंत्रता-सेनानी, संघर्षशील, स्वदेश-समर्पितम युद्धप्रिय सुभाष चन्द्र के महत्व से कौन इंकर कर सकता है।

नेताजी का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में जानकी दास बोस के यहां हुआ था। इनके पिता वकील थे। यह अपने माता-पिता की सातवीं संतान थे। इनके बचपन में पढाई कटक में ही हुई परंतु आगे की शिक्षा उन्होंने इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्राप्त की।

23 जनवरी की ठण्डी रात में जन्मे सुभाश के खून में वह गर्मी थी, जिसने गोरों के फौलादी शासन को मोम-सा पिघला दिया। भारत में सोए नौजवानों को जगाया। उन्होंने एक ऐसा नारा दिया जिससे प्रेरित होकर नौजवानों ने अपनी जान की बाजी लगा दी। उन्होंने ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दुंगा’ नारा देकर भारत के नौजवानों में क्रांति ला दी। सुभाष चन्द्र बोस ने जापान, इटली व फ्रांस में बसे भारतीयों की मदद से ‘आजाद हिन्द फौज’ का निर्माण किया तथा उनकी इस सेना ने अंग्रेजों पर आक्रमण बोल दिया।

इस घटना से प्रेरित होकर पूरा भारत जैसे नीन्द से जाग गया। भारत की फौज ने आजाद हिन्द फौज के खिलाफ लडने से इंकार कर दिया। अंग्रेजों के पांव उखड गए। जिस सेना के बल पर वे राज करते थे, उसी को सुभाष के बलिदान ने बागी बना दिया। परिणामस्वरुप भारत आजाद हो गया। तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासक चर्चिल का कहना था कि, “अंग्रेजों ने भारत को इसलिए मुक्त किय क्योंकि भारतीय सेना राजभक्ति की बजाय देशभक्ति पर उतर आई थी।“

आज स्वतंत्र भारत में हम आजादी की सांस ले रहे हैं, उसमें सुभाष के बलिदान की खुशबू है।

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