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हर व्यक्ति का दिनचर्या और प्राकितीक उत्पत्ती चीजों को रोकने से होने वाली बी�

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हर व्यक्ति का दिनचर्या और प्राकितीक उत्पत्ती चीजों को रोकने से होने वाली बीमारी

 

दिनचर्या में सुबह उठने से लेकर शौचादि से निवृत क्रिया, दांत शाफ करना, तेल मालिश, व्यायाम-स्नान, भोजन, विश्राम, अध्ययन, खेल-कूद और फिर सोना तक के सभी कार्यों का समावेश होता है। इन सभी कार्यों में ऋतु के अनुसार कुछ परिवर्तन आवश्यक होते है। जो व्यक्ति ऋतु के अनुसार अपनी दिनचर्या को नहीं बदलते-वही रोग के शिकार हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर-सर्दियों में अधिक व्यायाम लाभप्रद होता है जब्कि गर्मियों में अधिक व्यायाम हानिकारक हो जाता है।

दिनचर्या में हर व्यक्ति को चार चीजों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

आहार: आहार का मतलब है भोजन। भोजन हमारे शरीर के लिए बहुत आवश्यक है। भोजन का हमें विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि हम प्रकृति के विपरीत अथवा ऋतुओं के विपरीत भोजन ग्रहण करते हैं तो वही रोग का कारण बन जाता है। हमें इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए कि भोजन का मिश्रण कहीं विपरीत प्रभाव तो नहीं डाल रहा। जैसे-मछली के साथ दूध का सेवन निषेध है। वैसे आहार (भोजन) सदैव ताजा, हल्का, सुपाच्य, सही मात्रा में, रुचिकर सही समय पर करना चाहिए।

निद्रा: एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए नींद लेना बहुत आवश्यक है। समय पर सोना और समय पर उठना जितना आवश्यक है इतना ही आवश्यक है अवस्थानुसार नींद लेना भी। जैसे, बच्चों को दस घंटे सोना जरुरी है। युवकों को आठ घंटे सोना जरुरी है तथा वृद्धों को छ: घंटे सोना जरुरी है। जो व्यक्ति जब चाहे सो जाते हैं अथवा दिन में अधिक सोते हैं-वे स्वयं रोग को निमंत्रण देते है।

ब्रह्मचर्य पालन: जो लोग ब्रह्मचर्य के सिद्दांतों के विपरीत कार्य करते हैं-वो हमेशा रोगी बने रहते है। उनका शरीर अनेक बीमारियों का घर बन जाता है। अत: गृहस्थाश्रम में रहकर भी व्यक्ति को मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।

वेग-आवेग का त्याग: मनुष्य के शरीर में कुछ ऐसे दूषित तत्व होते है, जिनका शरीर से बाहर निकलना ही लाभकारी होता है। मल-मूत्र, छींक, जंभाई, हिचकी, प्यास अश्रु आदि ऐसे विषम तत्व हैं, जिनके वेगों को त्यागने के बदले, रोक दिया जाए तो अनेक रोगों के उत्पन्न होने सम्भावना रहती है। अत: इन शंकाओं को त्यागना ही श्रेयस्कार है। इस प्रकार यदि हम उत्पन्न रोगों का कारण जान लें तो चिकित्सा करने में बहुत सुविधा रहती है।

आज का व्यक्ति व्यस्ता के कारण आए हुए वेगों को रोक लेता है, किंतु इन साधारण वेगों का रुकना ही रोगों की उत्पत्ति का कारण बनता है, जो शरीर के लिए अनिष्ट्कारी सिद्ध होते है। ये मुख्य रुप से चौदह वेग है, जो रुक जाने पर बहुत ही अनिष्टकारी सिद्ध होते है।

(i) मल के वेग को रोकने से उत्पन्न रोग: मल के वेग को रोकने से मनुष के शरीर में कितने ही प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं, जिनमें प्रमुख है-प्रतिश्याम, शिर:शूल, उद्गार आना, ह्रदय की गति का बढ जाना, पेट क फूल जाना, उदर में वायु का गोला बन जाना, उदर पीडा, मूत्र में रुकावट पैदा हो जाना, कब्ज रहना, नेत्रों में भारीपन आना तथा भूख न लगने जैसे रोग उत्पन्न हो जाते है।

(ii) मूत्र रोकने पर उत्पन्न विकार: मूत्र को रोक लेने पर व्यक्ति के शरीर में अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जैसे-शरीर में पीडा, पथरी, मूत्रेन्द्रिय की जड में दर्द, पेट में वायु के गोले का बन जाना, घबराहट, बेचैनी होना आदि।

(iii) अपान-वायु के वेग को रोकने से उत्पन्न विकार: अपान-वायु के वेग को रोकने से निम्न रोगों की उत्पत्ति होती है। जैसे-पेट में अफारा, वायु का गोला बन जाना, शरीर में भारीपन और बेचैनी होना, पेट में दर्द, सिर-दर्द, उबकाई आना, दिल की धडकन बढ जाना इत्यादि।

(iv) डकार के वेग को रोकने से उत्पन्न विकार: डकार को रोकने से व्यक्ति के शरीर में निम्न विकार उत्पन्न हो जाते हैं। जैसे –शरीर में कम्पन पैदा होना, कलेजे में भारीपन, खांसी, हिचकी, तथा पेट में अफारा एवं भोजन में अरुचि होने लगता है।

(v) छींक को रोकने से उत्पन्न विकार: छींक को रोकने से शरीर मे टूटन तथा सिर में दर्द उत्पन्न हो जाता है।

(vi) प्यासे रहने से उत्पन्न विकार: व्यक्ति यदि प्यासा हो तो उसका मुंह सूखने लगता है, शरीर के अंग टूटने लगते हैं। चक्कर आने लगते हैं तथा छाती में दर्द होने लगता है।

(vii) भूख से उत्पन्न विकार: भूखे रहने पर व्यक्ति का शरीर टूटने लगता है। शरीर में कमजोरी आने लगती है। पेट में दर्द शोरु हो जाता है। सिर चकराने लगता है, बिना काम किए ही थकावट होने लगती है। इन्द्रियों मे शिथिलता आ जाती है और शरीर का रंग बदल जाता है।

(viii) नीन्द के न आने पर उत्पन्न विकार: नीन्द न आने से व्यक्ति का सिर चकराने लगता है, शरीर भारी हो जाता है। आंखे बोझिल हो जाती है। शरीर दर्द करने लगता है और जंभाई आने लगती है।

(ix) खांसी का वेग रोकने से उत्पन्न रोग: खांसी का वेग रोकने पर व्यक्ति की श्वांस तेज हो जाती है और दिल की धडकन बढ जाती है।

(x) श्वांस का वेग रोकने पर उत्पन्न विकार: श्वांस का वेग रोकने से व्यक्ति के पेट में वायु का गोला बन जाता है। ह्रदय का रोग और मूर्च्छा उत्पन्न हो जाती है।

(xi) जंभाई रोकने से उत्पन्न विकार: व्यक्ति यदि जंभाई रोक ले तो उसके सिर में दर्द, हाथ पैरों में कमजोरी, गर्दन या मुंह टेढा हो जाता है।

(xii) आंसुओं का वेग रोकने से उत्पन्न विकार: व्यक्ति यदि अपने आंसुओं का वेग रोक लेता है तो उसे जुकाम, आंखों की बीमारी, सिर और कलेजे में दर्द होना शुरु हो जाता है। खाने की अरुचि हो जाती है तथा पेट में वायु का गोला बन जाता है।

(xiii) वमन रोकने से उत्पन्न विकार: व्यक्ति यदि आने वाली उलटियों को रोक लेता है तो उसके शरीर में निम्न रोग उत्पन्न हो जाते हैं। जैसे- विसर्प रोग, कोढ, आंव, खुजली, पांखु रोग, ज्वर, कास, श्वांस, जी मचलाना, शोध, तथा झांई पैदा हो जाती है।

(xiv) वीर्य का वेग रोकने पर उत्पन्न रोग: व्यक्ति यदि अपने वीर्य का वेग रोक लेता है तो उसके अण्डकोष और इन्द्रिय में पीडा शुरु हो जाती है। ह्रदय में दर्द, ज्वर, मूत्रअवरोध, शरीर के अंगो में टूटन, अंड-वृद्धि, शकाश्मरी तथा नपुंसकता आदि का रोग उत्पन्न हो जाता है।

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