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जलजमनी से रोगों का उपचार

Feed by sandy Cat- Health & Beauty

जल जमनी को गुडमार बूटी भी कहते हैं। इसके दो चार पत्ते मुंह में डालकर चबाने के बाद गुड का भी स्वाद फीका लगेगा-इसीलिए इसे गुडमार बूटी कहते हैं। इसकी जड जमीन में गहरी जाती है। इसकी लतायें पेडों पर चढी होती हैं। इसके फूल एक लिंगीय, छोटे व हरे रंग के होते हैं। इसका फल पकने के बाद काले बैंगनी रंग का रसीला व एक बीज वाला होता है।

इसकी मुख्य पहचान यह है कि इसके पत्तों को जल में मसल देने पर कुछ ही मिनटों में जल जम जाता है, जिसे चाकू से काटकर टुकडे किए जा सकते हैं। इसी गुण के कारण इसका नाम जल जमनी पडा है। इसके फूल माह जुलाई-अगस्त में खिलते हैं। इसको औषधि रुप में प्रयोग किए जाने वाली मात्रा निम्नलिखित है:-

चूर्ण रुप में इसकी मात्रा केवल 2 माशे एक बार के सेवन में।

स्वरस के रुप में इसकी मात्रा केवल 2 मिलीग्राम एक बार के सेवन में।

 

पतली वीर्य को गाढा करने में: जिन लोगों का वीर्य पतला होने के कारण वे शीग्रपतन रोग का शिकार हो जाते है। ऐसे व्यक्तियों को प्रतिदिन सुबह-शाम जल जमनी के चूर्ण का सेवन 20 दिनों तक करना चाहिए। वीर्य गाढा हो जाएगा तथा शीग्रपतन के रोग से मुक्ति मिल जाएगी।

चोट : जिन लोगों के चोट लग जाती है-ऐसे लोगों की चोट पर जल जमनी के पत्तों को बांध देने से तीन दिन के प्रयोग से ही चोट ठीक हो जाती है।

उपदंश रोग: उपदंश के रोग में, जल जमनी के पत्तों का स्वरस रोगी को सुबह-शाम दो बार दस दिन तक सेवन करायें। उस स्वरस में 5 ग्राम जीरा तथा मिश्री पीस कर जरुर मिला लें। खाली स्वरस का सेवन न करें। उपदंश के रोग से मुक्ति मिल जाएगी।

वस्तिशोध एवं प्रमेह: इन रोगों में महिलायें प्रतिदिन सुबह-शाम जडके चूर्ण का सेवन करें। एक माह में रोग दूर हो जाएगा।

आमवात एवं सन्धि शोध:  इस रोग में पत्तों का चूर्ण त्रिकूट के साथ रोगी को सुबह-शाम 20 दिन तक सेवन करायें। रोग दूर हो जाएगा।

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