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सत्यानासी द्वारा रोगोपचार

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सत्यानासी का पौधा एक मीटर तक ऊंचा होता है। वैसे यह मैक्सिको का पौधा है लेकिन भारत में  ही यह प्राकृतिक रुप से पाया जाता है। यह पौधा अधिकतर हिमाचल प्रदेश में पैदा होता है- इसलिए इसे हिमवती भी कहते हैं।

इस पौधे के पत्ते तोडने उसके अन्दर से पीले रंग का दूध निकलता है, जिसके कारण इसका एक और नाम स्वर्ण क्षीरी भी है। वैसे इसे चार द्रव्यों का संग्रह माना गाया है जो निम्न हैं: -

स्वर्ण क्षीरी (सत्यानासी)   2. (हिमवती) हिरवी  3. पीत मूली  4. रेवेन्द उशारा।

उपरोक्त 2 से 4 तक की बूटी के लाभ भी सत्यानासी के लाभ जैसे हैं। औषधि के तौर पर इसकी मात्रा का उपयोग निम्न प्रकार करना चाहिए।

बीज चूर्ण के रुप में 2 ग्राम तक एक बार के सेवन में।

जड के चूर्ण के रुप में 2 ग्राम तक एक बार के सेवन में।

सत्यानासी तेल के रुप में 20 बून्द तक एक बार के सेवन में।

 

चर्म रोग: चर्म रोगों में जड की छाल को पानी में घिसकर उसका लेप लगाने से दस दिन के प्रयोग से ही चर्म रोग दूर हो जाते हैं।

आंख के फूले: जिन लोगों की आंखों में फूले अथवा जाली पडने लगती है- ऐसे लोगों की आंख में सत्यानासी का दूध एक-एक बूंद प्रतिदिन सोते समय डालने से एक माह में ही फूले कटकर साफ हो जाते हैं।

मूत्रजनन एवं व्रणरोपण : इन रोगों में सत्यानासी का दूध बहुत उपयोगी है। उसके प्रयोग से केवल 10 दिन में ही रोग दूर हो जाता है।

उपदंश : उपदंश के रोग में रोगी को प्रतिदिन सुबह-शाम सत्यानासी के जड का चूर्ण सेवन करने से 20 दिन के अन्दर ही रोग दूर हो जाता है।

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