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पाठा से रोगों का उपचार

Feed by sandy Cat- Health & Beauty

पाठा, आरोगी लता जाति का एक अंग है। इसके सफेद फूल जुलाई-अगस्त में खिलते हैं। यह मैदानी भागों से लेकर हिमालय की 1200 मी. की ऊंचाई तक पाया जाता है। यह केवल औषधि रुप में ही प्रयोग होता है। दवा की खुराक के रुप में इसकी निम्न मात्रा में प्रयोग करनी चाहिए।

1 चूर्ण रुप में 2 ग्राम एक बार के सेवन में। 2. काढे रुप में 2 तोले एक बार के सेवन में।

सर्दी बुखार तथा मलेरिया मे अचुक दवा: मलेरिया अथवा सर्दी के बुखार आ जाने पर रोगी को पाठा की जड का चूर्ण सुबह-शाम एक गिलास दूध के साथ एक हफ्ते भर सेवन कराने से बुखार दूर हो जाएगा।

पेचिश एवं अतिसार का दवा: पेचिश एवं अतिसार का रोग होने पर रोगी को पाठा के पत्तों का चूर्ण सुबह- शाम दही या लस्सी के साथ सेवन कराने से 15 दिन के अन्दर ही पेचिश व अतिसार रोग से मुक्ति मिल जाएगी।

प्रसवकाल: प्रसवकाल के दौरान पाठा के जड के चूर्ण की पोटली बनाकर गर्भवती महिला की योनि में रखने से बच्चे के जन्म में कष्ट नही होता। प्रसव आसानी से हो जाता है।

अपच, पेट दर्द, रक्तसार, ज्वर तिसार, एवं अतिसार: उपरोक्त रोगों में पाठा के जड का चूर्ण सुबह-शाम शहद अथवा किसी शर्बत में मिलाकर 15 दिन तक सेवन करायें ये सब बिमारियों से मुक्त हो जायेंगे।

बृक एवं मूत्राशय के रोग: इन रोगों में पाठा के जड का चूर्ण सुबह-शाम किसी शर्बत में मिलाकर 15 दिन तक सेवन कराने से उपरोक्त रोगों से मुक्ति मिल जाएगी।

शारीरिक कमजोरी : शारीरिक कमजोरी में रोगी द्वारा पाठा के जड के चूर्ण का सुबह-शाम गाय के दूध के दही के साथ 40 दिन सेवन कराने से शरीर की कमजोरी दूर हो जाती है।

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