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करीर से रोगों का उपचार

Feed by sandy Cat- Health & Beauty

करीर के वृक्ष अधिकतर रेतीले मैदानों में पैदा होते हैं। कभी कभार हल्के-हल्के पत्तों की कोंपले शाखाओं पर फूट पडती है, केवल कांटे होते है। कभी कभार हल्के-हल्के पत्तों की कोंपले शाखाओं पर फूट पडती है, जो अपने आप ही झड जाती है। जनवरी से मार्च तक इस पर फूल खिलते है-उसके बाद फल लगते है। कच्चा फल हरें रंग का होता है तथा पकने के बाद लाल गुलाबी रंग का हो जाता है। इसका अचार पडता है, जो टेंटी का अचार कहा जाता है। यह पौधा भारत के गर्म एवं शुष्क प्रदेशों जैसे-राजस्थान, कच्छ, गुजरात, पंजाब तथा गंगा के उत्तरी मैदानों में पाया जाता है।

नेत्र रोग: नेत्र रोगों में करीर के फलों की सब्जी का सेवन बहुत लाभकारी होता है। आंखे लाल हों, करकराती हों अथवा दुखती हों ऐसे रोगी को करीर के फलों की बिना मिर्च की सब्जी दो वक्त सेवन करनी चाहिए। एक हफ्ते के प्रयोग से ही न्त्र रोग ठीक हो जाते है।

शोध रोग: शोध रोगों में करीर के पुष्प का चूर्ण बनाकर 2 ग्राम सुबह, 2 ग्राम शाम को गाय के दूध के साथ अथवा शहद के साथ रोगी को 10 दिन तक सेवन करायें। रोग दूर होजाएगा। इसकी जड का काढा भी शोध रोग व मृदु रेचक में विशेष लाभकारी होता है।

अर्शरोग: अर्श रोग होने पर 500 ग्राम करीर के फलों को साफ कर पानी में उबालकर धूप में सुखा लें। फिर 50 ग्राम फलों को दही के साथ सुबह-शाम रोगी को सेवन कारायें। 10 दिन में अर्श रोग दूर हो जाएगा।

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