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धूप सलाई से रोगों का उपचार

धूप सलाई के मध्यम कद के सुन्दर वृक्ष होते है। इसके पतों को हाथी बदे चाव से खाते है इसलिए इसे गजभक्ष्या भी कहा जाता है। मार्च-अप्रैल में इसके फूल खिलते है तथा अगस्त सितम्बर के महीने में इसके फल पकते है। यह वृक्ष अधिकतर पहाडी ढलानो पर ही पैदा होता है।

इसके फल अण्डाकार, लम्बा, आयतकार होते है जो पकने के बाद पीले रंग के हो जाते है। इसके वृक्ष में चीरा लगाकर एक प्रकार का गोन्द प्राप्त किया जाता है, जो लोबान कहलाता है। यह अपने गुणों के कारण ही औषधि रुप में प्रयोग किया जाता है।

पेट एवं कमर दर्द: पेट और कमर दर्द होने पर इसके पत्तों को पीसकर उसका कमर और पेट के ऊपर लेप करने से दर्द दूर हो जाता है। तीन दिन के प्रयोग से ही दर्द जड से चला जता है।

खांसी, दमा तथा गले के रोग: जिन लोगों को गले के रोग के साथ-साथ खांसी व दमे का रोग भी है ऐसे रोगी को इसकी छाल का चूर्ण बनाकर 3-3 ग्राम सुबह शाम शहद के साथ सेवन कराने से खांसी 3 दिन में, गले का रोग 10 दिन में तथा दमा 60 दिन में चला जाता है।

अतिसार तथा बादी रोग: जिन लोगों को बादी हो जाती है-उनका शरीर फूल जाता है। अतिसार का रोग होने पर इसके वृक्ष की छाल का चूर्ण 3-3 ग्राम सुबह शाम शहद में मिलाकर एक माह सेवन कराने से बादी खत्म हो जाती है तथा अतिसार रोग दूर हो जाता है।

कुष्ठ रोग : जिन लोगों को कुष्ठ रोग हो जाता है-ऐसे रोगी को वृक्ष की छाल का चूर्ण 3-3 ग्राम सुबह-शाम शहद के साथ सेवन कराने से तीन माह में ही कुष्ठ रोग दूर हो जाता है। इसके साथ ही इसके पतों का लेप रोग के स्थान पर भी करते रहना चाहिए।

इसके लोबान का धुआं भी लाभकारी होता है। उससे वातावरण शुद्ध होता है। रोग के कीटाणु खत्म होते है।

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