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मालकंगनी से रोगों का उपचार

मालकंगनी का वृक्ष झाडी के समान लता के रुप में होता है। इसके पत्ते कई प्रकार के होते हैं। इसके फूल छोटे, पीले और हरे रंग के होते हैं, जो मई के महीने में खिलते हैं। इसका फल पकने पर मटर के आकार का लाल-पीले रंग में तीन कोष्ठों वाला होता है, इसके अन्दर से तिकोने बीज निकलते हैं। इस वृक्ष पर फल सितम्बर – अक्टूबर माह में लगते हैं। इसकी पैदावार हिमालय की नीचे वाली घाटियों में तथा समान रुप से रहने वाले मौसमी मैदानी भागों में होती है। औषधि रुप में इसके बीज एवं बीज का तेल ही प्रयोग किया जाता है। दवा की खुराक के रुप में इसकी निम्न मांत्रा लेनी चाहिए।

बीज के चूर्ण की मात्रा 2 ग्राम एक बार के सेवन में और बीज के तेल की मात्रा 3 बून्द से 20 बून्द तक एक बार के सेवन में।

स्मरण शक्ति बढायें : जिन लोगों की स्मरण शक्ति कमजोर होती है-ऐसे रोगी को मालकंगनी के तेल को गाय के 25 ग्राम घी के साथ मिलाकर सुबह-शाम सेवान कराने से 60 दिनों में स्मरण शक्ति बढ जाती है।

मन्दबुद्धियों के लिए लाभप्रद: मन्दबुद्धि लोगों अथवा बच्चों को मालकंगनी के तेल को ताजा 25 ग्राम मक्खन में मिलाकर सुबह –शाम सेवन कराने से बुद्धि तेज हो जाती है।

वात रोग तथा मूत्र रोग: मूत्र के रोग लापरवाही बरतने पर बडे खतरनाक सिद्ध होते हैं। रोगी को वात रोग भी परेशान करता है। ऐसे रोगियों को मालकंगनी के बीजों का चूर्ण शहद के साथ सुबह-शाम सेवन कराने से 20 दिन में ही उपरोक्त रोग दूर हो जाते है।

मिरगी रोग: मिरगी के रोगीको मालकंगनी के बीजों का तेल 25 ग्राम ताजा मक्खन के साथ सुबह-शाम सेवन कराने से 40 दिन के प्रयोग में ही मिरगी के दौडे पडने बन्द हो जाते है।

नेत्र ज्योति: मालकंगनी के तेल का उपयोगी नेत्र ज्योति वृद्धि में भी अत्यंत लाभकारी होता है। इसमें 25 ग्राम देसी घी के साथ सुबह-शाम दो माह तक सेवन करें। नेत्र ज्योति बढ जाएगी।

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