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अतिबला से रोगों का उपचार

अतिबला का पौधा दो मीटर तक ऊंचा होता है। इसके फूल पांच पंखुडियों वाले पीले रंग के होते हैं। सिअके फल से काले बीज निकलते हैं, जो लुआबदार होते हैं। इसके फल सर्दी के मौसम में पैदा होते हैं। यह पौधा पूरे भारत में पाया जाता है। यह केवल औषधि रुप में ही प्रयोग किया जाता है।

मूत्र रोग: मूत्र रोगों में अतिबला का काढा दिन में तीन बार रोगी को सेवन कराने से केवल 10 दिन में ही मूत्र रोग व मूत्र विकार दूर हो जाते हैं। चाहे वह रुक-रुककर आता हो, जलन व दर्द के साथ आता हो अथवा सुजाक का रोग ही क्यों न हो? सभी रोग दूर हो जाते हैं।

वस्तिशोध: वस्तिशोध में अतिबला के पत्तों व जड का काढा बनाकर सुबह-शाम रोगी को सेवन कराने से दस दिन में ही वस्तिशोध से मुक्ति मिल जाती है।

रक्त प्रदर: रक्त प्रदर के रोग में अतिबला की जड का दो चम्मच रस दो चम्मच मक्खन के साथ मिश्री मिलाकर रोगी को सुबह शाम दस दिन तक सेवन करायें। रक्त प्रदर का रोग दूर हो जाएगा।

शारीरिक कमजोरी व नपुंसकता: जो लोग शरीर से कमजोर हैं और नपुंसक्ता के शिकार है-ऐसे लोगों को अतिबला के बेज तथा जड का चूर्ण बनाकर शहद एवं ताजा मक्खन के साथ 3-3 ग्राम सुबह-शाम 60 दिनों तक सेवन करायें। शरीर की कमजोरी दूर हो कर वीर्य में वृद्धि होगी। नपुंसकता का रोग खत्म हो जाएगा। नई शक्ति पैदा होगी।

जोडो के दर्द:  जोडों के दर्द में इसके पत्तों को पानी में पीसकर सुबह शाम उसका लेप करने से शरीर के जोडों का दर्द दूर हो जाता है। लेकिन इसका लेप लगातार प्रतिन 40 दिन तक करें तभी लाभ पहुंचेगा।

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