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रोहिणी से रोगों का उपचार

रोहिणी का वृक्ष भारत के मैदानी भागों, मिर्जापुर, मध्यप्रदेश, बिहार, बुन्देलखण्ड तथा छोटा नागपुर के जंगलों में पाया जाता है। अप्रैल-मई के महीनों में इसके फूल खिलते हैं तथा सर्दी के मौसम में फल आते हैं। यह वृक्ष शरीर में मांस की वृद्धि करता है-इसलिए इसे मांस रोहिणी भी कहते हैं। इसका प्रयोग औषधि रुप में ही किया जाता है।

शरीर के घाव में : शरीर में कैसा भी घाव हो जाए, छोटा हो, गहरा हो, बडा हो, रोहिणी की छाल को पीसकर उसमें थोडी सी हल्दी मिलाकर घाव में भर दें और ऊपर से पट्टी बान्ध दें। साथ में छाल का काढा बनाकर सुबह-शाम एक-एक कप रोगी को सेवन करायें। छोटा घाव केवल तीन दिन में भर जाएगा तथा बडा घाव 10 दिन में ही भर जाएगा।

बुखार : बुखार हो जाने पर इसकी छाल का काढा बनाकर उसमें थोडी सी मिश्री मिलाकर रोगी को सुबह-शाम आधा-आधा कप सेवन करायें। तीन दिन में ही बुखार चला जाएगा।

अतिसार रोग: अतिसार रोग में रोहिणी की छाल का चूर्ण 2 ग्राम सुबह-शाम शहद के साथ मिलाकर 10 दिन तक रोगी को सेवन करायें। अतिसार रोग दूर हो जाएगा।

रक्त विकार: व्यक्ति के रक्त में विकार उत्पन्न हो जाने पर रोहिणी की छाल का काढा बनाकर रोगी को प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करायें। 15 दिन में ही रक्त विकार दूर होकर खून साफ हो जाता है वरना रक्त में विकार उत्पन्न होने पर अनेक रोग पैदा हो जाते हैं, जिसमें चर्म रोग मुख्य होते हैं।

वैसे इसका काढा स्तम्भक, व्रणारोपक एवं व्रणशोधक भी होता है, क्योंकि इसकी छाल में सत्व, राल, स्टार्च एवं टैनिक अम्ल के तत्व पाये जाते हैं।

श्वांस एवं कृमि रोग: श्वांस एवं कृमि रोग में भी रोहिणी की छाल का काढा बहुत लाभदाकारी होता है। सुबह-शाम इसका प्रयोग करने पर 60 दिन में श्वांस रोग (दमा) तथा कृमि रोग से मुक्ति मिल जाती है।

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