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अंकोल से रोगों का उपचार

अंकोल का वृक्ष मध्यम आकार का कांटों से भरा होता है। इसके फूल गुच्छों में खिलते हैं, जो सुगन्धित होते हैं। फूलों के खिलने पर यह वृक्ष बिना पत्तों का हो जाता है। उस वक्त इस पर केवल कांटे और फूल ही दिखाई देते हैं। इसके फल पकने पर तांवई रंग के हो जाते है। यह भारत में राजस्थान, पंजाब, उडीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल के मैदानी भागों के अलावा दक्षिण भारत के पर्वतीय प्रदेशों के जंगलों में खूब पाया जाता है। इसकी छाल एवं बीज और इसके बीजों का तेल ही औषधि रुप में उपयोगी है।

दर्द: शरीर के किसी भी भाग में दर्द हो। उस स्थान पर इसकी छाल को पानी में पीसकर उसका लेप क देने से दर्द दूर हो जाता है।

वायुदर्द एवं जोडों के दर्द: जिन लोगों को गठिया का रोग है या फिर गैस का दर्द है-ऐसे रोगी के जोडों पर इसके बीज के तेल की मालिश सुबह-शाम करनी चाहिए। 60 दिन की मालिश से जोडों का दर्द दूर हो जाता है।

वायु दर्द में तेल की मालिश उस स्थान पर करनी चाहिए जहां दर्द हो। तीन दिन की मालिश से ही वायु दर्द से छुटकारा मिल जाएगा।

अतिसार के रोग: अतिसार के रोग में रोगी को अंकोल की जड का चूर्ण 3 ग्राम तंडुलोदक के साथ सुबह-शाम पिलाने से 10 दिन में ही अतिसार का रोग दूर हो जाते है।

शीघ्रपतन का इलाज: जिन लोगों को शीघ्रपतन की शिकायत है-ऐसे व्यक्ति की नाभि पर प्रतिदिन रात को सोते समय अंकोल के बीज के तेल की मालिश 40 दिन तक करते रहने से शीघ्रपतन का रोग दूर हो जाएगा। वीर्य भी गाढा हो जाएगा।

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