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गुग्गल से रोगों का उपचार

गुग्गल के वृक्ष झाडीनुमा होता है। इसकी गांठों से ही गुग्गल पैदा होता है। इसके फूल एक गुच्छे के अन्दर खिलते हैं। सर्दी के मौसम में गुग्गल पैदा होता है। इसके फूल एक गुच्छे के अन्दर खिलते हैं। सर्दी के मौसम में गुग्गल की उन गांठों में चेरा लगाने से एक सुगन्धित पदार्थ निकलता है, जो गुग्गल कहलाता है। इसके वृक्ष भारत में बहुत अधिक पाए जाए हैं। इसका सुगन्धित पदार्थ ही औषधि रुप में प्रयोग किया जाता है। गुग्गल कीटाणुनाशक होता है। इसको जलाने से उस जगह का वातावरण शुद्ध हो जाता है।

शोथ रोग: शोथ रोग उत्पन्न होने पर आधा गिलास गौ मूत्र में 5 ग्राम गुग्गल मिलाकर रोगी को सुबह-शाम सेवन कराने से 20 दिन में शोथ रोग दूर हो जाता है।

रक्त विकार: गुग्गल का चूर्ण, 5 ग्राम सुबह-शाम कुकन्दर के कांजी के साथ रोगी को सेवन कराने से दस दिन में ही खून साफ कर रक्त विकारों को दूर कर देता है, जिससे चर्म रोग उत्पन्न नहीं होते।

कमजोरी: आमवात एवं उरुस्तम्भ रोग: उपरोक्त होने पर रोगीको गुग्गल का चूर्ण शिलाजीत के साथ मिला कर 5 ग्राम सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन कराने से 40 दिन के अन्दर ही उपरोक्त रोग एवं कमजोरी दूर हो जाती है। शरीर मं एक नई शक्ति आ जाती है।

चर्मरोग एवं सन्धिवात (जोड दर्द) और उपदंश: जोडों का दर्द, उपदंश तथा चर्मरोगों में पुराना गुग्गल का चूर्ण बनाकर 5-5 ग्राम सुबह-शाम गाय के दूध के साथ रोगी को सेवन कराने से, 60 दिन में सब रोग दूर हो जाते हैं।

खांसी एवं बलगम के लिए: खांसी कैसी भी हो पुरानी हो या नई, शरीर में जमे बलगम को निकालने के लिए गुग्गल का चूर्ण 5-5 ग्राम काले नमक व मिश्री के साथ सुबह-शाम सेवन करने से रोगी की खांसी दस दिन में ही दूर हो जाती है और बलगम भी साफ हो जाता है।

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