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तुगला से रोगों का उपचार

तुगला मध्यम आकार का वृक्ष होता है जो झाडियों सदृश्य होता है। इसके पत्ते तिकोने तथा गोलदंतु धार वाले होते हैं। इस वृक्ष की हरी शाखाओं पर मई-जून के महीनों में छोटे-छोटे पीले रंग के फूल मंजरियों में खिलते हैं। इसके फल गोल मसूर के दाने की तरह चिकने एवं भूरे रंग के होते हैं, जो पकने पर मीठे हो जाते है। अगस्त-सितम्बर माह में इसके फल लगते है और गोन्द निकलता है। यह हिमालय पर उत्तराखण्ड गढवाल, कुमांयु, जम्मू-कश्मीर, खांसिया की पहाडियों में पाया जाता है। इसके फल और गोंद ही औषधि रुप में प्रयोग किये जाते है। इसकी खुराक 2 ग्राम बच्चों के लिए तथा 5 ग्राम बडों के लिए। इसकी तासीर ठण्डी होती है।

पित्त एवं खांसी: खांसी एवं पित्त रोग में तुगला के एक कच्चे फल का सुबह शाम सेवन करने से तीन दिन में खांसी दूर हो जाती है तथा पित्त साफ हो जाता है।

कासहर रोग: कासहर के रोग में रोगी को इसके पके फल का सेवन सुबह शाम कराने से 10 दिन में रोग दूर हो जाता है।

हाई ब्लड प्रेशर: हाई ब्लड प्रेशर के रोगी को इसके पके फलों के रस का सुबह-शाम सेवन कराना चाहिए। ये खून के दबाव को ठीक कर देता है।

मूत्र रोग: जिन लोगों के मसाने कमजोर हो जाते है उन्हें मूत्र अधिक आता है। ऐसे रोगी द्वारा 5 ग्राम गोन्द का चूर्ण देसी घी में भूनकर सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने पर सात दिन में ही मूत्र का अधिक आना कम हो जाएगा। मसानों में शक्ति आ जाएगी।

अतिसार, वमन और दाह (गर्मी) रोग: उपरोक्त रोगों में इसके पके फल का रस सुबह-शाम सेवन करने से रोगी के ये रोग 10 दिन में ही दूर हो जाते है।

गर्मी के बुखार: गर्मी के मौसम में अक्सर अधिक गर्मी की अधिकता के कारण लोगों को बुखार आ जाता है। ऐसे रोगी को तुगला के पके फल का रस सुबह-शाम सेवन कराने से शरीर की गर्मी कम हो जाएगी और सात दिन में ही बुखार दूर हो जाएगा।

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