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अपराजिता से रोगों का उपचार

अपराजिता की बेल चारों ओर फैली होती है। इसके पत्ते बहुत छोटे होते हैं। यह रोगों को दूर करने में पूरी तरह समर्थ है-इसलिए इसे अपराजिता कहा जाता है। इसके फूलों का उपयोग पूजा में भी किया जाता है। इसके फल जून जुलाई में लगते हैं। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में खुली जगहों पर इसकी लताएं पायी जाती है। इसके जड बीज और पत्ते ही औषधि रुप में प्रयोग किये जाते हैं।

छोटे बच्चों की खांसी दस्तजिन बच्चों को दस्त लग जाते हैं, खांसी हो जाती है उनके लिए अपराजिता के बीजों को थोडा-सा भूनकर उसमें गुड तथा सैन्धा नमक डालकर कूट लें, उस चूर्ण का एक-एक चम्मच रोगी को सुबह-शाम ताजा पानी के साथ सेवन करायें। सात दिन में ही दस्त बन्द हो जाएंगे तथा खांसी दूर हो जाएगी।

जलोदर एवं मूत्र रोग: जलोदर तथा मूत्र रोगों में अपराजिता के पत्तों का रस निकालकर उसमें थोडी सी मिश्री मिलाकर आधा-आधा कप सुबह-सुबह रोगी को सेवन कराने से 10 दिन में ही मूत्र रोगों तथा जलोदर से मुक्ति मिल जाती है। मूत्र के सारे विकार दूर हो जाते है।

सांप के काटे में: सांप के काट लेने पर इसकी जड व बीज का काढा बनाकर एक-एक कप हर तीन घंटे बाद सांप के काटे व्यक्ति को सेवन करायें तथा जड को घिसकर सांप के काटे वाले स्थान पर लगा दें। सांप के विष का असर खत्म हो जाएगा और व्यक्ति विष के प्रभाव से बच जाएगा।

गले की व्याधियां: गले में उत्पन्न रोगों में अपराजिता की जड व पत्तों को पानी में डालकर उबाल लें। फिर उस पानी से गरारे करने पर गले की सब व्याधियां दूर हो जाती है।

पेट रोग एवं कफ रोग: पेट रोग एवं कफ रोग में अपराजिता की जड एवं बीजों को कूट पीसकर चूर्ण बनाकर 5-5 ग्राम सुबह-शाम गुनगुने पानी से सेवन करने पर 10 दिन में पेट दर्द, अफारा, बदहजमी के रोग दूर हो जाते हैं तथा कफ साफ हो जाता है।

सन्धिवात व वायुयोग: वायुरोग व सन्धिवात के रोग में अपराजिता के बीजों का चूर्ण बनाकर उसमें गुड मिला कर एक-एक चम्मच ताजा पानी के साथ रोगी को सुबह शाम सेवन करायें। एक माह में उपरोक्त रोग दूर हो जाएंगे।

अपराजिता से तैयार किये जाने वाले योग: अपराजिता के बीजों एवं जड के गर्भपात रस, स्वर्णमकरध्वज तथा कुमार्यासव योग तैयार किये जाते हैं, जो कितने ही रोगों में काम आते हैं।

अपराजिता से तंत्र प्रयोग: अपराजिता को तंत्र में भी प्रयोग किया जाता है। ये प्रयोग कई प्रकार से किए जा सकते हैं।

रविवार के दिन पुष्यनक्षत्र में अपराजिता की जड को मुंह में रखने अथवा सिर पर धारण करने से शस्त्रस्तम्भन हो जाता है।

अपराजिता के तंत्र प्रयोग से बांझ स्त्री भी गर्भधारण कर सकती है। इस प्रकार के लिए अपराजिता की जड को बकरी के दुध में पीसकर ऋतुकाल के समाप्त होने पर स्त्री के स्नान कर लेने के बाद तीन दिन तक सेवन करायें तो बांझ स्त्री भी गर्भ धारण करके संतान प्राप्त कर सकती है।

अपराजिता के सात दिन के तंत्र प्रयोग से काक बन्धवा स्त्री भी गर्भधारण योग्य हो जाती है। इस प्योग के लिए अपराजिता को भैंस के दूध में पीसकर, उसे भैंस के मक्खन में मिलाकर काक बान्ध्या स्त्री को सात दिन तक करायें।

अपराजिता के तंत्र प्रयोग से डाकिनी-शाकिनी एवं दानव राक्षसों का कोई भय नहीं रहता। इस प्रयोग के लिए सफेद अपराजिता के पत्तों एवं जावित्री दोनों के रस को नाक में सुंघाने से डाकिनी-शाकिनी राक्षस तथा दानव का कोई भय नहीं रहता।

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