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बीजक से रोगों का उपचार

बीजक का वृक्ष मध्यम आकार का घने पत्तों वाला होता है। जनवरी-फरवरी में इसके फूल खिलते हैं और मार्च से अप्रैल के बीच में इसमें फल लगते हैं। यह वृक्ष भारत के मैदानी इलाकों में पाया जाता है। इसके फूल, छाल, गोंद और लकडी ही औषधी रुप में प्रयोग की जाती है। इससे निम्न रसायन योग तैयार किए जाते है।

इसके रसायन से सारासव, महानील तेल तथा बीज का रिष्ठ तैयार किया जाता है जो अनेक रोगों में काम आते है।

दर्द: दर्द कैसा भी हो और कहीं पर भी हो। इसकी छाल एवं लकडी (सार) का काढा बनाकर उसमें शहद मिला कर रोगी को सुबह-शाम एक-एक कप का सेवन कराने से हर दर्द दूर हो जाता है।

कान दर्द : इसके महानील तेल की एक-एक बून्द कान में डालने से अथवा इसके फूलों के रस की एक-एक बून्द कान में डालने से कान दर्द दूर हो जाता है।

मूत्र रोग एवं शूगर रोग: जिन लोगों को शूगर की बीमारी होती है अथवा मूत्र रोग होते हैं-ऐसे रोगियों को बीजक की छाल तथा लकडी दोनों का काढा बनाकर सुबह-शाम सेवन कराने से 60 दिन में ही शूगर रोग दूर हो जाता है तथा 20 दिन में मूत्र के सभी रोग दूर हो जाते है।

गले की व्याधियां एवं उरु रोग: गले की व्याधियों तथा उरु रोगों में इसकी छाल व सार के काढे में शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने के सेवन से 20 दिन में ही उपरोक्त रोग समाप्त हो जाते हैं। साथ ही फूलों का लेप गले पर भी करना लाभकारी होता है।

पीलिया एवं पांडु रोग: पीलिया एवं पांडुरोग में छाल व सार के काढे का सुबह शाम से 20 दिन में दोनों रोग दूर हो जाते है।

 

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