Print Document or Download PDF

कालमेघ से रोगों का उपचार

कालमेघ के पौधे एक मीटर तक लम्बे होते हैं। इसके पत्ते भालाकार गहरे हरे रंग के होते हैं। इसके फूल द्विकोष्ठी होते हैं, जो जुलाई से सितम्बर तक खिलते है। फल अक्टूबर में लगते हैं। इसका स्वाद तीखा होता है। यह प्राकृतिक पौधा है, जो देश के मैदानी भागों में पाया जाता है। विशेष तौर पर बंगाल में ज्यादा होता है। इसका पंचांग ही औषधि रुप में प्रयोग किया जाता है।

शारीरिक कमजोरी एवं रक्त विकार: जिन लोगों का शरीर कमजोर होता है-उनके रक्त में भे अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं जो रोगों के उत्पन्न होने का कारण होते हैं। ऐसे रोगी को इसके पंचांग का काढा बनाकर गाजर के रस के साथ मिलाकर सुबह-शाम सेवन कराने से एक माह के अन्दर ही खून के विकार दूर हो जाते है। नया खून बनने लगता है तथा शरीर की कमजोरी दूर हो जाती है।

जिगर बढने पर: जिन लोगों के जिगर बढ जाते है, जिसमें बच्चों की संख्या अधिक होती है- ऐसे रोगी को कालमेघ के पंचांग का दो चम्मच रस एक चम्मच सिरके में मिलाकर सुबह-शाम सेवन कराने से एक माह में बढा हुआ जिगर कम होकर ठीक हो जाता है। बच्चे को दवा की दवा की आधी खुराक का सेवन कराएं।

बुखार एवं जीर्ण शोथ: जिन लोगों को बुखार हो जाता है एवं शरीर में सूजन आ जाती है-ऐसे रोगी को कालमेघ में पंचांग का चूर्ण 3-3 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ अथवा शहद के साथ सेवन कराने से 10 दिन में रोग दूर हो जाते हैं।

Read More.


Go Back