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तालमखाने से रोगों का उपचार

तालमखाने पौधे एक मीटर लम्बे कांटेदार होते हैं। इसके तने ईख के समान गन्ध वाले शाखा रहित होते हैं। इसके फूल समूहों में बैंगनी रंग के होते हैं। इसके फूल नवम्बर से जनवरी तक खिले रहते हैं, जो बाद में फलों का रुप धारण कर लेते हैं। इसके फल में छोटे-छोटे 5 से 10 बीज तक होते हैं। यह पौधा ज्यादार धान के क्षेत्र और नालों के पास पाया जाता है। इसके बीज, पंचांग और क्षार ही औषधि रुप में प्रयोग किये जाते है।

मूत्र रोग: मूत्र के तमाम रोगों में तालमखाना एक गुणकारी औषधि है। मूत्र का रुकना, रुक-रुककर मूत्र आना अथवा जलन से आना आदि रोगों में इसकी जड का काढा एक-एक कप सुबह-शाम रोगी को सेवन कराने से तीन दिन में मूत्र विकारों से मुक्ति दिला देआ है। इससे मूत्र खुलकर आता है।

सुजाक रोग: सुजाक का रोग बडा भयंकर होता है। ऐसे रोगी को पंचांग का काढा बनाकर सुबह-शाम सेवन कराने से 20 दिन के अन्दर सुजाक का रोग दूर हो जाता है, क्योंकि सुजाक के रोग में मूत्र नली में जख्म हो जाते हैं, जो दवा से भर जाते हैं और सूख जाते हैं।

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