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परिभद्र से रोगों का उपचार

परिभद्र के वृक्ष मध्यम आकार के होते हैं, जो कांटों से भरे होते हैं। इन पर अप्रैल-मई में लाल रंग के फूल खिलते हैं तथा फल-जुलाई अगस्त में लगता है। इसकी जड, छाल, पत्ते व फूल औषधि रुप में प्रयोग किए जाते हैं।

अनिद्रा एवं बुखार : जिन लोगों को नीन्द न आने का रोग होता है- उन्हें बुखार आ जाने पर और भी नीन्द नहीं आती। ऐसे रोगी को इसकी छाल का काढा बनाकर सुबह-शाम सेवन कराने से ही तीन दिन में बुखार दूर हो जाता है तथा नीन्द भी आने लगती है।

व्रण शोथ एवं जोडों के दर्द: जोडों के दर्द और व्रण शोथ में इसकी जड को पीसकर उसका सुबह शाम लेप करने से 20 दिन में ही दर्द दूर हो जाते हैं।

कृमि एवं मूत्र रोग: जिन लोगों के मूत्र में विकार उत्पन्न हो जाता है। मूत्र रुक-रुककर आता है। मूत्र में जलन होती है तथा कुछ लोगों के पेट में कीडे पड जाते हैं-ऐसे रोगी को परिभद्र की जड और छाल का काढा बनाकर सुबह शाम सेवन कराने से, 10 दिन में ही मूत्र रोगों के विकार दूर हो जाते हैं तथा पेट के कीडे निकल जाते हैं।

कान दर्द: जिन लोगों के कान में दर्द हो जाता है-ऐसे रोगी के कान में इसके पत्तों का रस निकाल कर एक-एक बून्द डालने से दर्द दूर हो जाते हैं।

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