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गुंजा से रोगों का सही उपचार

गुंजा की लताएं हिमालय की निचली घाटियों से लेकर मैदानी भागों तक सब जगह पायी जाती है। इसके पत्ते इमली के पत्तों की तरह होते हैं। इनका स्वाद मीठा होता है। इसके फूल गुलाबी होते है, जो जुलाई अगस्त के महीने में खिलते हैं और फल दिसम्बर-जनवरी में लगते हैं। जंगली कोल एवं मील इसके बीजों के आभूषण बनाकर पहनते हैं। गुंजा को स्ती भी कहते हैं। यह बीज वही स्ती होती है जिसे सुनार लोग सोना तोलने के काम में प्रयोग करते हैं। इसके जड, पत्ते और बीज औषधि रुप में प्रयोग किए जाते हैं।

गले की आवाज बन्द होने पर: कुछ लोगों की आवाज गले की खराबी के कारण बैठ जाती है। भारी हो जाती है और कभी-कभी बन्द भी हो जाती है। ऐसे रोगी को इसकी पत्तियों गोली बनाकर मुंह में रखकर चूसने से ही आवाज खुल जाती है।

खांसी, कफ, कंडु एवं कृमि रोग: जिस व्यक्ति को खांसी कफ हो जाए तथा पेट में कीडे पैदा हो जाएं या कंडु का रोग हो जाए, ऐसे रोगी को गुंजा की जड और पत्तों का काढा बनाकर सुबह-शाम सेवन कराने से तीन दिन में खांसी का रोग तथा 20 दिन में कफ, कंडु और कृमि रोग दूर हो जाता है। रोगी स्वस्थ हो जाता है।

गंडमाला, दांतों के कीडे तथा शिरा रोग: गंडमाला शिराओं एवं दातों के कीडों में गुंजा की जड का लेप बहुत लाभकारी होता हैं, इसकी जड को पीसकर गंडमाला शिराओं पर लेप करने से 20 दिन में रोग ठीक हो जाता है। जड का पिसा हुआ चूर्ण कीडे लगे दांतों में लगाने से 10 दिन में ही लभा हो जाता है। कीडे निकल जाते है।

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