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शिलारस से रोगों का उपचार

शिलारस के वृक्ष बहुत बडे होते हैं। इसके तने को छीलने से जो द्रव निकलता है वह शिलारस कहलाता है। यह शहद के समान गाढा, जल से भारी भूरे रंग का होता है, जिसे थैली में बन्द करके रख दिया जाता है। यह वृक्ष तुर्की से यहां आया था। इसके फूल मार्च-अप्रैल के महीने में खिलते हैं। इस वृक्ष का रस औषधि रुप में प्रयोग किया जाता है। इसमें उडनशील तेल, सिन्नेमिक एसिड, बेजोइक एसिड, स्टाइरोल आदि तत्व पाये जाते है।

क्षयरोग, बुखार एवं श्वांस रोग के लिए: जिन लोगों को टी.बी., दमा अथावा टाइफाइड बुखार के रोग हो जाता है। ऐसे रोगी को दो चम्मच शिलारस, एक चम्मच शहद में मिलाकर सुबह-शाम सेवन कराने से टाइफाइड 10 दिन में ही दूर हो जाता है तथा क्षय रोग और श्वांस की बीमारी 90 दिन में दूर हो जाती है।

कंडू एवं चर्म रोग: कंडू एवं चर्म रोग हो जाने पर रोगी को एक चम्मच शिलार, दो चम्मच तिल के तेल (मिठे तेल) में मिलाकर सुबह-शाम सेवन कराने से 20 दिन में चर्म रोग एवं कंडू जैसे रोग दूर हो जाते हैं।

धात एवं सुजाक के रोग: जिन पुरषों को मूत्र के साथ धात बहती हो अथवा जिन्हें सुजाक का रोग हो गया हो उनको दो चम्मच शिलारस 5 ग्राम मुलेठी के चूर्ण के साथ सुबह शाम सेवन कराने से एक माह में धात बहनी बन्द हो जाएगी तथा सुजाक का रोग ठीक हो जएगा।

अण्डकोष की वृद्धि से रोकने के लिए: अक्सर लोगों के अण्डकोष बढ जाते हैं और खूब बडे हो जाते हैं। ऐसे रोगी को धतूरे के पत्ते में शिलारस लगाकर अण्डकोषों पर सुबह-शाम बांधने से बढे हुए अण्डकोष 20 दिन के सेवन से ही अपनी सही स्थिति में आ जाते हैं और आगे उनकी वृद्धि नहीं होती है।

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