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लाल ओंगा से रोगों का उपचार

ओंगा दो रंग का होता है। श्वेत ओंगा तथा दूसरा लाल ओंगा। वैसे तो ये दोनों एक जैसे होते हैं। फिर भी इनके डंठलों में अंतर होता है। श्वेत आंगा का डंठल सफेद तथा लाल ओंगा का डंठल लाल होता है। दोनों के बीज में भी अंतर होता है। स्वेत ओंगा के बीज चपटे तथा लाल ओंगा के बीज कुछ गोल होते हैं। इनका प्रयोग रोगों के साथ-साथ तांत्रिक क्रियाओं में किया जाता है।

दमा: जिस व्यक्ति को दमे का रोग हो, उसे ओंगा की फल वाली टहनी को तम्बाकू की तरफ चिलम में रखकर पीने से दमा का दौरा रुक जाता है।

चर्म रोग, शोथ, गलगंड एवं जलोदर: इन सभी रोगों में ओंगा की जड का काढा बनाकर सुबह-शाम आधा-आधा कप पीने से 10 दिन में ही उपरोक्त रोग दूर हो जाते हैं।

दांत दर्द होने पर: दांतों के दर्द में ओंगा के रस को मिलने से दर्द बन्द हो जाता है।

कान दर्द एवं बहरापन: ओंगा की पत्तियों का रस निकाल कर बहरे व्यक्ति के कान में सुबह-शाम दो-दो बून्द डालने से एक माह में बहरापन काफी हद तक दूर हो जाता है। कान दर्द भी बन्द हो जाता है।

विषम ज्वर: जिस व्यक्ति को एक दिन छोडकर एक दिन बुखार आता हो, तो ऐसे रोगी के दाएं हाथ पर रविवार के दिन ओंगा की जड बान्ध देने से विषम ज्वर तीन दिन में ही ठीक हो जाता है। इसके साथ-साथ ओंगा को 21/2 पत्तियों को पीसकर गुड के साथ सुबह-शाम सेवन करायें।

कुत्ता, सर्प एवं बिच्छू के काटने पर: यदि किसी व्यक्ति को कुत्त, सांप काट ले अथवा कोई बिच्छू डंक मार दे तो श्वेत ओंगा की पत्तियों को पीस कर उस स्थान पर लेप कर दें। विष का प्रभाव खत्म हो जाएगा।

दंत मुख रोग एवं कंठ विकार: इन रोगों में ओंगा के समूचे पौधे को जलाकर उसकी भस्म बना लें और फिर उस भस्म को रोगी के दांतों पर मिलने से उपरोक्त रोग एक सप्ताह के प्रयोग से ही ठीक हो जाता है।

प्रसव वेदना: यदि कोई गर्भवती स्त्री ओंगा की जड का छोटा टुकडा योनि के अन्दर रख ले तो उसकी प्रसव वेदना समाप्त हो जाती है और प्रसव शीघ्र हो जाता है।

ओंगा से तंत्र प्रयोग:

ओंगा के बीजों के चावलों को, भैंस के दूध में घी डालक्र खीर बनाकर खाने कई दिनों तक भूख नहीं लगती।

मंगलवार के दिन लाल ओंगा की जड को कमर में बांधकर सहवास करने से पुरुष वीर्यपात देर में होता है।

लाल ओंगा की टहनी से लगातार छ: माह तक दातून करने से आवाज अदभूत चमत्कार पैदा हो जाता है। और  वाचसिद्धि प्राप्त हो जाती है।

लाल ओंगा की जड को घिसकर चन्दन के तरह माथे पर तिलक लगाने से व्यक्ति में संतान की प्राप्ति होती है।

ओंगा की जड को दीये की भांति जलाकर लौ पर किसी बच्चे का ध्यान केन्द्रित कराने से उस बच्चे को बत्ती की लौ में वांछित दृश्य दिखाई लेने लगेंगे।

मुस्लिम तंत्र हाजरात (दिव्य-दृष्टि) में भी इसका प्रयोग होता है।

ओंगा, लाजा, भांगरा, तथा सहदेवी, इन चारों को पीसकर इसको माथे पर तिलक लगा लेने से उस व्यक्ति में तीनों लोगों को सम्मोहित करने की शक्ति पैदा हो जाती है।

ओंगा और सहदेवी को लोहे के पात्र में रखकर पीसकर मस्तक पर उसका तिलक लगाने से सभी प्राणियों की वृद्धि का स्तम्भन हो जाता है।

श्वेत ओंगा और बहेडा की जडों को रवि पुष्य नक्षत्र योग में प्रापत करके दोनों को एक पोटली में बान्धकर जिस घर में रख देंगे उस घर के सभी लोगों का उच्चाटन हो जाएगा।

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