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काकजंघा से रोगों का उपचार

काकजंघा के पौधे ऊंचे-नीचे टीलों अथवा इधर-उधर जंगलों में होते हैं। ये मुख्यत: जल के पास वाली नम भूमि में अधिक पाये जाते हैं। इसकी आकृति ठीक काक के जंघा की तरह लगती है, इसी कारण इसका नाम काकजंघा पडा। इसका मूल ही औषधि रुप में प्रयोग किया जाता है।

हड्डी टूटने पर: हड्डी टूट जाने पर काकजंघा की जड के 20 ग्राम रस में 15 दाने काली मिर्च के पीसकर एक हफ्ते सेवन करने से टूटी हड्डी जुड जाती है। 35 वर्ष से अधिक के स्त्री-पुरुषों की हड्डी जुडने में थोडा वक्त लग सकता है।

चर्म विकार व खुजली: काकजंघा के मूल का रस शरीर पर मलने से खुजली व चर्म विकार दूर हो जाती है।

कान में कीडे: कान में कीडे पड जाने पर व्यक्ति को चैन नहीं पडता। ऐसे रोगी के कान में काकजंघा की बूटी का रस डालने से तीन दिन में ही कान के कीडे साफ हो जाते हैं।

अनिद्रा: अनिद्रा भी एक प्रकार का रोग होता है। जिन लोगों को नीन्द नहीं आती ऐसे लोगों को काकजंघा सिर में बांध लेने से गहरी नीन्द आ जाती है।

काकजंघा से तंत्र प्रयोग:

काकजंघा का प्रयोग वशीकरण मंत्र के लिए अधिक किया जाता है। जिस स्त्री को वश में करना हो, काकजंघा, तगर, केसर और मैनशिल का चूर्ण बनाकर उस स्त्री के सिर पर डाल दें। वह स्त्री पूरी तरह वश में वश में हो जाएगी। यह वशीकरण का उत्तम मंत्र है।

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