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ईसबगोल से रोगों का उपचार

ईसबगोल, एक प्राकृतिक बूटी है, जो हिमालय की पहाडियों में पैदा होती है। इसके पौधे की आयु मात्र एक वर्ष है। फरवरी-मार्च के महीनें में इसके फूल खिलते हैं तथा अप्रैल-मई में फल लगते हैं। यह एक ऐसी बूटी है जो मानव शरीर के अनेक रोगों को दूर करने में सहायक सिद्ध हुई है। इसकी तासीर ठण्डी होती है। वैसे यह फारस देश से भारत आने वाला विदेशी पौधा है। सिअके बीच से जो छिलका उतरता है-वह ईसबगोल की भूसी कहलाती है-जो औषधि रुप में प्रयोग की जाती है।

पेचिश:  पेचिश का रोग पेट की गर्मी बढ जानेके कारण होता है। ऐसे समय में, ईसबगोल की 2 ग्राम भूसी लेकर एक गिलास पानी में कुछ देर के लिए भिंगो दें। जब भूसी फूल-जाए तो उसमें थोडी सी मिश्री मिलाकर इस भूसी का सुबह और रात दो वक्त रोगी को सेवन कारायें। तीन दिन के सेवन से ही पेट की सारी आंव बाहर निकाल कर आंते साफ कर देगी।

पेट के रोग एवं कब्ज: कब्ज एवं पेट दर्द के रोगी को रात को सोते समय 3 ग्राम ईसबगोल भूसी दो गिलास गुनगुने पानी के साथ सेवन करायें। एक हफ्ते के सेवन से ही रोग दूर हो जाएंगे। कब्ज दूर हो जाएगी। दर्द खत्म हो जाएगा तथा पेट के अन्य रोग भी जैसे पेट की गर्मी, गैस आदि भी खत्म हो जाएगा।

संग्रहणी: जिन लोगों को संग्रहणी रोग हो गया है-ऐसे रोगी को ईसबगोल भूसी, हरड तथा बेल का सूखा गूदा, तीनों चीजों को 20-20 ग्राम लेकर उसको कूटपीस कर चूर्ण बना लें। दो चम्मच सुबह, दो चम्मच शाम ताजा पानी के साथ सेवन करायें। एक माह के सेवन से ही संग्रहणी का रोग खत्म हो जाता है।

दमा: दमा के रोगी को ईसबगोल की भूसी 3 ग्राम प्रतिदिन गर्म पानी के साथ सेवन करायें। 90 दिन के प्रयोग से पुराने से पुराना दमा ठीक हो जाता है।

जीर्ण, खूनी बवासीर, गर्मी बुखार, बार-बार प्यास लगना: उपरोक्त सभी रोगों में ईसबगोल की भूसी का सेवन 3-3 ग्राम सुबह-शाम ठण्डे ताजा पानी अथवा दही के साथ करने से 20 दिन के प्रयोग से ही उपरोक्त रोगों में लाभ प्राप्त हो जाएगा।

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