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हृत्पत्री से रोगों का उपचार

हृत्पत्री क पौधा भारतवंशी पौधा नहीं है। इसका बीज बाहर देश से आया है लेकिन अब इसकी खेती भारत के पहाडी अंचलों में की जाती है। इसके फूल तिल पुष्प की भांति सफेद गुलाबी रंग के होते हैं, लेकिन इसकी पत्तियां ही औषधि के रुप में प्रयोग की जाती है।

मूत्र रुकने पर: जिन व्यक्तियों का मूत्र किन्हीं विकारों के कारण रुक जाता है, बडा कष्टदायक होता है तथा रोगी का पेट फूल जाता है। अत: ऐसे रोग में हृत्पत्री के पत्तों को पानी में डालकर काफी देर तक उबालना चाहिए। इसके बाद ठण्डा करके उस पानी को कपडे में छान लें। फिर उस पानी को रोगी को दिन में तीन चार बार सेवन करायें। रुका हुआ मूत्र खुल कर आयेगा और विकार दूर हो जाएंगे। यह विधि लागातार तीन दिन अपनाएं।

दिल के दर्द में: दिल के दर्द में हृत्पत्री की पत्तियों का रस निकालकर दो चम्मच, शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम रोगी को सेवन करायें। एक माह के सेवन से ही आधा रोग ख्त्म हो जाएगा।

क्षय रोग: जिन लोगों को क्षय रोग हो गया है। ऐसे रोगी को हृत्पत्री की पत्तियों का रस शहद के साथ मिलाकर दो चम्मच दिन में चार बार 60 दिन तक लगातार सेवन करायें। क्षय रोग से मुक्ति मिल जाएगी।

उपचार की यह विधि खांसी के रोग में भी बडी लाभकारी है। तीन दिन के सेवन में ही खांसी खत्म हो जाती है।

विशेष: हृत्पत्री के पानी में डिजिटेलीन नाम का एक एलकेलाइड तत्व पाया जाता है, जो दिल को शक्ति देता है और हृदय के सब रोगों को हृदय से निकालकर बाहर कर देता है। अत: यह हृदय रोगियों के लिए संजीवनी बूटी मानी जाती है।

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