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हपुषा के पत्तों से रोगों का उपचार

हपुषा का वृक्ष भी हिमाचल पर्वत पर पाया जाता है। इस वृक्ष के नुकीले पत्ते तीन-तीन चक्रों में निकलतें हैं। इस पर मई-जून में फूल खिलते हैं और फल सितम्बर माह में लगते हैं। इसके फल छोटे बेर की तरह गोल, मांसल तथा पकने पर कृष्ण नीलाभ रंग के सुगन्धित; स्वादिष्ट रंजीन युक्त होते हैं। इसके पत्ते, फल तथा उडनशील तेल बहुत से रोगों में औषधि रुप में काम आते हैं।

सांस रोग तथा गैस रोग: सांस रोगी एवं गैस रोगी के लिए हपुषा के पत्तों का रस अत्यंत लाभकारी होता है। ऐसे रोग में हपुषा के पत्तों को 200 ग्राम पानी में उबालें और जब पानी आधा रह जाए तो छान लें। उसमें थोडी सी मिश्री मिलाकर प्रतिदिन तीन बार 40 दिन तक रोगी को सेवन कराएं। दोनों रोगों से रोगी को मुक्ति मिल जाएगी। ऐसे रोगियों को हपुषा के पके फलों का भी सेवन लाभकारी रहगा।

पेट के समस्त रोग: पेट के समस्त रोगों में पत्तों व फलों को 500 ग्राम पानी में खूब उबालें। जब 250 ग्राम पानी रह जाए तो किसी कपडे से छान लें। फिर उस पानी में काला नमक, काली मिर्च मिलाकर पेट के रोगी को आधा-आधा कप दिन में तीन बार सेवन करायें। दस दिन के सेवन से ही, पेट का दर्द, आंतों की सूजन तथा जिगर की खराबी दूर हो जाएगी। आंतों के घाव में, तथा जिगर की खराबी के बढने में यह उपचार लगातार साठ दिन तक चलना चाहिए-तभी रोग दूर होंगे। आंतों के घाव भी भर जाएंगे और बढा हुआ जिगर भी काम हो जाएगा।

नारी रोग: लुकोरिया का रोग महिलाओं का सबसे बुरा रोग है। ऐसी महिलाओं को भी ऊपर दी गई विधि से बनाए गए काढे का सेवन कराना चाहिए-प्रतिदिन सुबह-शाम। 60 दिनों तक काढे का प्रयोग करना चाहिए। लुकोरिया के रोग से मुक्ति मिल जाएगी। इसके साथ ही मूत्र के अन्य रोगों में भी लाभकारी होगा।

सुजाक रोग: जिन पुरुषों को सुजाक का रोग हो जाता है। पेशाब रुक-रुककर जलन के साथ आता है-ऐसे रोगी को हपुषा के पत्तों का रस आधा कप, दो चम्मच मिश्री के साथ घोलकर प्रतिदिन सुबह-दोपहर-शाम सेवन करायें। 40 दिन तक लगातार सेवन करते रहने से सुजाक का रोग खत्म हो जाता है।

जोडों के दर्द तथा अन्य दर्दों में: जिन लोगों के जोडों में दर्द के अलावा शरीर के किसी अन्य भाग में दर्द है अथवा किसी चोट का दर्द है ऐसे रोगी हपुषा के उडनशील तेल को शराब में मिलाकर उस स्थान पर प्रतिदिन तीन चार बार 60 दिनों तक मिलें। सब दर्द उडन छू हो जाएंगे।

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