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जूही के फूलों से रोगोपचार

जूही भी चमेली की लता जैसी होती है। यह भी प्राकृतिक रुप में जन्म लेती है। इसके ऊपर के पत्ते बडे और नीचे के छोटे होते है। यह लता भी हिमालय की नीचे की घाटियों में अधिक पाई जाती है। इसके फूल भी सफेद रंग के सुगन्ध से भरे होते हैं, जूही चार वर्ग की होती है।

जूही के निम्न वर्ग है:

जूही की पहली जाति-स्वर्ण जाती होती है। जूही की दूसरी जाति मलिका-मोतिया होती है, जिसे मालती भी कहते हैं। तीसरे प्रकार की जूही कुन्द जाति की होती है। चौथे प्रकार की जूही गणिका जाति की होती है।

जूही का प्रयोग भी औषधि के रुप में किया जाता है। इसके फूलों की तासीर ठण्डी होती है।

मूत्र रोगों में: जिन लोगों के मूत्र में जलन होती है। खून या मवाद आता है अथवा रुक-रुककर मूत्र आता है। ऐसे रोगियों को जूही के फूलॉं का दो चम्मच रस, दो चम्मच मिश्री के साथ 250 मि.ली. पानी में मिलाक्र प्रतिदिन सुबह-शाम रोगी को एक माह तक सेवन करायें। मूत्र रोगों से मुक्ति मिल जाएगी

शरीर का ताप: जिन लोगों का कोठा गर्म होता है-उनके शरीर का ताप गर्मी के मौसम में बहुत बढ जाता है। आंखों के आगे अन्धेरा छाने लगता है। ऐसे रोगी को जूही के फूलों का रस 250 मि.ली. पानी में मिलाकर, उसमें मिश्री घोलकर प्रतिदिन सुबह-शाम दस दिन तक करायें। शरीर की बढी हुई गर्मी हो जाएगी। रोगी को आराम आ जाएगा।

वैसे जूही के फूलों का रस पित्त नाशक भी होता है। पित्त के अचानक भडक जाने पर जूही के रस का सेवन बहुत लाभकारी होता है।

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