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कमल के फूल से रोगोपचार

कमल के फूल पानी के कीचड में खिलते हैं। यह तालाबों के बीच में पानी के अन्दर ही जन्म लेता है। मई तथा जून माह में कमल के फूल खिलते हैं। कमल की डंडी जो कमल गठ्ठा कहलाती है-सब्जी के काम आता है तथा इसका फल तालमखाने भी एक प्रकार की मेवा होती है। इस फूल की तासीर ठण्डी होती है। इसका फूल औषधि के रुप में प्रयोग किया जाता है।

शरीर ताप: जिन लोगों के शरीर का गर्मी के मौसम में ताप बढ जाता है-ऐसे रोगी को कमल के फूल का रस निकालकर उसमें मिश्री घोलकर शर्बत के तौर पर सुबह-शाम सेवन करायें। दस इन के प्रयोग में ही शरीर का बढा हुआ ताप कम हो जाएगा। उसके शरीर में नयी शक्ति भर देगा।

मूत्र रोग: जिन लोगों के मूत्र में गर्मी पैदा हो जाती है-ऐसे रोगी का मूत्र पीला व जलने के साथ रुक-रुककर आता है। ऐसे रोगी को कमल के फूलों की पत्तियों का रस निकाल कर मिश्री के साथ घोलकर दिन में चार बार सेवन कराना चाहिए। दस दिन में ही मूत्र रोग दूर होजाते हैं और रोगी को आराम आ जाता है।

बांझ रोग में: जिन महिलाओं के बच्चे नहीं होते और जो बांझ होती है-ऐसी महिलाओं को कमलपुष्प के शतदल के आधा छोटा गिलास रस को शहद के मूत्रसाथ मिला कर सुबह शाम चार माह तक सेवन करायें। महिलाओं का बांझपन दूर हो जाएगा और वह गर्भधारण करने योग्य हो जाएंगी।

नपुंसकता: जो लोग नपुंसकता होते हैं-जिनमें काम शक्ति पैदा नहीं होती ऐसे रोगी को कमल पुष्प के शतदलों का एक तोला चूर्ण, गाय के दूध में मिश्री डालकर चार माह तक लगातार प्रतिदिन सुबह शाम सेवन करायें तथा कमल के फल यानि कि ताल मखाने को भी 20 ग्राम प्रतिदिन खिलायें। व्यक्ति की नपुंसकता दूर हो जाएगी। उसके शरीर में नई शक्ति नया जोश भर जाएगा।

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