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मुचुकुन्द के फूलों से रोगोपचार

मुचुकुन्द बदे सुगन्धित, पर्णकोणीय, द्विलिंगी, अकेला या गुच्छे के रुप में खिलते हैं, जिसमें दो या तीन फूल पीले वर्ण के होते है। इनके वृक्ष मध्यम आकार के घनी कोमल शाखाओं के होते हैं। यह हिमालय की तराई वाले क्षेत्रों में अधिक पाये जाते हैं। मुचुकुन्द के फूल औषधि के रुप में भी प्रयोग किए जाते है। इसके सुगन्धित पुष्पों में उडनशील तेल पाया जाता है।

सिर दर्द: जिन लोगों के पूरे सिर में या आधे सिर में दर्द रहता है-ऐसे रोगी को दिन में दो बार मुचुकुन्द के फूलों को पीसकर माथे पर लेप करना चाहिए। इसका प्रयोग दस दिनों तक लगातार करते रहने से सिर का कैसा भी दर्द हो दूर हो जाता है।

गर्भाशय शोध एवं गर्भाशय रक्तस्त्राव: जिन महिलाओं के गर्भाशय में सूजन हो जाती है अथवा गर्भ के दौरान रक्त स्त्राव रक्त होने लगता है-ऐसी महिलाओं को फूलों के रस में दो बार मुचुकुन्द के फूलों को पीसकर माथे पर लेप करना चाहिए। इसका प्रयोग दस दिनों तक लगातार करते रहने से सिर का कैसा भी दर्द हो दूर हो जाता है।

गर्भाशय शोध एवं गर्भाशय रक्तस्त्राव: जिन महिलाओं के गर्भाशय में सूजन हो जाती है अथवा गर्भ के दौरान रक्त स्त्राव होने लगता है-ऐसी महिलाओं को फूलों के रस में दो चम्मच शहद तथा एक चम्मच देसी घी मिलाकर दिन में दो बार सेवन करना चाहिए तथा पेट पर फूलों का लेप लगाना चाहिए। सात दिन के लगातार सेवन में सूजन ठीक हो जाती है तथा रक्त आना बन्द हो जाता है।

खांसी रोग: खांसी कैसी भी हो? नई हो, पुरानी हो-फूलों का दो चम्मच रस, एक चम्मच शहद तथा एक चम्मच अदरक का रस मिलाकर रोगी को दिन में तीन चार बार सेवन कराने से तीन दिन में खांसी का रोग खत्म हो जाता है। पुरानी खांसी के लिए पन्द्रह दिन तक दवा का सेवन करना चाहिए।

खून के विकार: जिन लोगों के खून में विकार उत्पन्न हो जाता है-ऐसे लोगों के शरीर पर चर्म रोग पैदा हो जाते हैं। तरह-तरह के इंफैक्शन हो जाते हैं। ऐसे रोगी को फूलों के रस का प्रतिदिन सुबह शाम प्रयोग करना चाहिए। पन्द्रह दिन के सेवन में ही खून के अन्दर के विकार दूर हो जाते हैं। चर्म रोग भी खत्म हो जाता है।

वातरक्त, विसर्प, कास एवं गले के रोग: मुचुकुन्द के फूलों का रस उपरोक्त रोगों में अत्यंत लाभकारी होता है। रोगी को प्रतिदिन फूलों के रस का दिन में दो बार सेवन करना चाहिए। पन्द्रह दिन के सेवन से ही रोग दूर हो जाते हैं।

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