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सरसों से रोगों का उपचार

सरसों खेती से पैदा की जाती है। इसकी गणना द्रव्य पदार्थों में आती है, क्योंकि इससे तेल निकलता है, जो खाने के काम आता है। लगाने के काम आता है। इसका तेल कटु होता है। इसका तथा इसके तेल का प्रयोग भी औषधि रुप में किया जाता है।

दांतों व मसूडों की मजबूती: दातों और मसूडों की मजबूती के लिए सरसों का तेल औषधि के रुप में गुणकारी है। तेल में पिसा हुआ सेन्धा नमक मिलाकर दांतों और मसूडों पर मंजन की तरह लगाने से दांत और मसूडे मजबूत होते हैं और कोई रोग भी नहीं होता

कान दर्द: कभी-कभी जब कान में दर्द हो जाता है तो सरसों के तेल में लहसुन की के कली जलाकर उस तेल को कानों में डालने से कान का दर्द बन्द हो जाता है। वैसे भी छोटे बच्चों के कान में उनकी मताएं अक्सर तेल गर्म करके डालती है जिससे कान भी साफ हो जाता है और सुनने की शक्ति भी तेज बनी रहती है।

शरीर की खुश्की: बहुत से लोगों के शरीर में खुश्की पैदा हो जाती है। त्वचा रुखी हो जाती है। खुश्की भी एक तरह का रोग है। ऐसे लोगों को प्रतिदिन स्नान करने से एक घंटा पहले अपने पूरे शरीर पर सरसों के तेल की मालिश करनी चाहिए। इससे खुश्की भी दोर हो जाती है और चर्म रोग भी पैदा नही होते

उरुस्तम्भ रोग: उरुस्तम्भ रोग में करंज के बीज तथा सरसों को गाय के मूत्र में पीसकर लेप करें। सात दिन के लेप से रोग दूर हो जाता है।

चोट लगने पर: कभी कभी बच्चों को खेलते हुए चोट लगने से शरीर का कोई हिस्सा छिल जाता है, ऐसी चोटों पर सरसों के तेल की पट्टी बांध देने से तीन दिन में ही चोट ठीक हो जाती है।

आंखों के रोग: आंखों में सरसों के तेल का काजल बनाकर डालने से आंखों की रोशने भी तेज होती है और आंखों के रोग भी उत्पन्न नहीं होते। नवजात शिशुओं व छोटे बच्चों को हर रोज उनकी माताएं सरसों के तेल का काजल पार कर डालती है। काजल बनाने के लिए रुई की बत्ती बनाकर सरसों के तेल में भिंगोकर उसे जलायें और फिर उसके ऊपर स्टील के चमचे में अथवा फूल के किसी बर्तन को लगातार काजल बना सकते है। यह सूखा काजल कहलाता है।

उन्माद व अपस्मार के रोग: इन रोगों के उत्पन्न हो जाने पर करंज के बीज तथा सरसों को बराबरी की मात्रा में लेकर बकरी के मूत्र में मिलाकर पीस लें और फिर उसके लेप का प्रयोग करें। सात दिन के लेप में ही रोग दूर हो जाएगा।

 

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